Thursday, 13 June 2013

नितीश कुमार के लिए १९९६ के पहले अटलजी ,अडवानीजी और सुशिल मोदीजी जो साम्प्रदायिक थे पर वही तीनो १९९६ के बाद धर्मनिरपेक्ष कैसे बन गए ? तथा नितीश कुमार के लिए २००२ के बाद सिर्फ नरेन्द्र मोदीजी साम्प्रदायिक बन गए पर भाजपा मात्र धर्मनिरपेक्ष पार्टी कैसे बनी रही ?



देश की जनता को यह जानना होगा की , नितीश कुमार ऐसे राजीनीतिज्ञ है जो सत्ता में हमेशा बने रहने के खेल में माहिर है . १९९२ में नितीश कुमार जनता दल में थे और लालू प्रसाद यादव के साथी तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री वि पि सिंह के मंत्री मंडल में कृषि राज्य मंत्री थे ,उसी काल में राममंदिर आन्दोलन उफान पर था तो इस आन्दोलन का विरोध करते हुए नितीश कुमार के तत्कालीन साथी और बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने राम मंदिर निर्माण के लिए जो रथयात्रा श्री लालकृष्ण अडवाणीजी के नेतृत्व में चल रही थी उसे बिहार में रोका था और श्री लालकृष्ण अडवाणीजी को गिरफ्तार किया था तब नितीश कुमार तत्कालीन अपने साथी लालू प्रसाद के साथ तो थे ही पर अडवाणीजी के भी विरोध में थे और तो और समाजवादी विचारो वाले नितीश कुमार संघ के भी विरोध में थे कारण हर समाजवादी मानता है की संघ जातीयवादी तथा धार्मिक संघठन है ,इसलिए श्री लालकृष्ण अडवाणीजी उसी संघ के स्वयंसेवक है एवं पूर्व में प्रचारक भी रहे थे इसलिए नितीश कुमार उनके भी विरोधक थे और अडवाणीजी को साम्प्रदायिक मानते रहे थे . पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी भी संघ के प्रचारक रहे है और भाजपा श्रेष्ठ नेता थे जो राम मंदिर आन्दोलन में सम्मिलित होने के कारण समाजवादि नितीश कुमार के नजरो में खलनायक रहे है इसलिए नितीश कुमार अटलजी के भी विरोधक थे और अटलजी को साम्प्रदायिक माना करते थे .इन्ही दोनों भाजपा के शीर्ष नेताओ की तरह बिहार के विद्यमान उपमुख्यमंत्री सुशिल कुमार मोदी भी संघ के प्रचारक रहे है और राममंदिर आन्दोलन में सक्रिय सामिल थे इसलिए नितीश कुमार उनके भी विरोधक रहे है उन्हें भी साम्प्रदायिक माना करते थे, पर भाजपा के इन तीनो नेताओ को नितीश कुमार ने १९९६ के पहले साम्प्रदायिक माना था ,कारण १९९६ के बाद नितीश कुमार की पार्टी ने भाजपा के साथ गठजोड़ किया था इसलिए १९९६ के बाद भाजपा के ये तीनो नेता नितीश कुमार के लिए धर्मनिरपेक्ष बने ....

नितीश कुमार भारतीय राजनीती में शातिर राजनीतिज्ञ माने जाते है ,जिन्हें सत्ता में बने रहने में महारत हासिल है जो १९९० से अब तक कुछ एक ५-६ साल छोड़ दिए जाए तो हमेशा सत्ता में शीर्ष के पद पर रहे है,१९५१ में जन्मे बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार को धर्मनिरपेक्षता के संस्कार और राजनीती के पाठ उनके पिताजी कविराज रामलखन सिंह से मिले हुए है जो १९५७ के पहले राष्ट्रीय कांग्रेस के बिहार में एक बड़े नेता थे तथा कांग्रेसी नेता अनुग्रह नारायण सिन्हा के कट्टर समर्थक(शिष्य ) थे ,पर १९५२ और १९५७ के आम चुनावो में कांग्रेस का टिकट ना मिलने के कारण कांग्रेस छोड़कर जनता पार्टी में सामिल हुए बाद में अपने सुपुत्र नितीश कुमार को भी जनता पार्टी में लाकर अपने गुरु अनुग्रह नारायण सिन्हा के पुत्र सत्येन्द्र नारायण सिन्हा से जोड़ दिया जो पूर्व में कांग्रेसी थे पर उस काल में जनता पार्टी बिहार राज्य के अध्यक्ष थे ......... फिर क्या अपने पिताजी की मदत से १९७५ में राजनितिक जीवन शुरू करने वाले नितीश कुमार १९८० में बिहार विधानसभा का चुनाव लड़कर हार गए बाद में १९८५ में विधायक बने ,१९८७ में बिहार युवा लोकदल के अध्यक्ष ,१९८९ में बिहार जनता दल के महामंत्री और लोकसभा सांसद ,१९९० में भाजपा के समर्थन पर चल रहे वि पि सिंह के मंत्रिमंडल में केंद्रीय कृषिराज्य मंत्री , १९९६ में भाजपा से गठबंधन करने के बाद १९९८ में अटलजी के मंत्रिमंडल में रेल मंत्री २००४ तक केंद्र में मंत्री बाद में २००५ में भाजपा की मेहरबानी से मुख्यमंत्री बने जो आज तक मुख्यमंत्री है .

नितीश कुमार जानते है की उन्हें जो अब तक सत्ता में जो बड़े बड़े पद मिले है वो गठबंधन की राजनीती के कारण .१९८९ से आज तक जो भी बड़ा पद प्राप्त हुआ है नितीश कुमार को वो गठबंधन की सरकारों में ,वे अपने पार्टी के माध्यम से अकेले सत्ता हासिल नहीं कर सके है ,उन्हें हर बार भाजपा का साथ लेना ही पड़ा उसमे भी उन्हें अटलजी ,अडवाणीजी और सुशिल मोदीजी का साथ मिला है जो गठबंधन की राजनीती को मानते है .इसलिए नितीश इन तीनो नेता को अपने हिसाब से धर्मनिरपेक्ष मानते होंगे .

पर नितीश कुमार ये भी जानते है की गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदीजी गठबंधन के राजनीती के बजाय शत प्रतिशत भाजपा की राजनीती पर ही चलते है ,उसका उदहारण यह है की मोदीजी १९८७ में संघ से भाजपा में आये गुजरात के संघठन महामंत्री के रूप में .मोदीजी ने पहला चुनाव व्यवस्थापन अहमदाबाद महानगरपालिका में अपने हाथ में लिया जिसमे भाजपा ने राज्य में मित्र पक्ष जनता दल को अहमदाबाद महानगरपालिका के चुनाव में साथ न लेकर खुद भाजपा का बहुमत हासिल किया और बाद में पुरे राज्य में भी यही प्रयोग जारी रखते हुए १९९५ में भाजपा को दो तिहाई बहुमत हासिल कराया , उसका परिणाम यह निकला की गुजरात राज्य से जनता दल खत्म हुआ तथा कांग्रेस ख़त्म होने की कगार पे है और आज ग भाजपा की अकेले दम पर आज तक गुजरात विधान सभा में बहुमत के साथ सत्ता है ,इसी १९८७ से १९९५ के बिच नितीश कुमार जनता दल में ही थे जिन्होंने अपने पार्टी को गुजरात में ख़त्म होते हुए देखा है मोदीजी के चुनाव रणनीति के कारण .

नितीश कुमार मानते है की अगर मोदीजी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन जाते तो स्वाभाविक रूप से मोदीजी के हाथ भाजपा की कमान आ जाएगी जिससे यह होगा की भाजपा के मित्र पक्ष जिसमे जदयु भी है वो सभी का अस्तित्व धोके में आ जाएगा और तो और अगर मोदीजी प्रधान मंत्री बन गए तो आने वाले १५ से २५ साल तक भाजपा की सत्ता बनी रहेगी जिससे भाजपा के सभी मित्र पक्ष शायद ख़त्म हो जायेंगे मोदीजी के लगातार प्रभाव के कारण .

इसलिए नितीश कुमार भाजपा के ऐसे नेताओ को समर्थन देना चाहते है जो गठबंधन की राजनीती के समर्थक है जिनमे अटलजी ,अडवाणीजी और सुशिल मोदीजी है जिन्हें धर्मनिरपेक्ष बताते है नितीश कुमार, पर नितीश कुमार को मोदीजी साम्प्रदायिक इसलिए दिखाई देते है कारण अगर मोदीजी को कमान मिलती है भाजपा की तो नितीश कुमार का अस्तित्व ही धोके में आता दिखाई देता है .......